हिन्दी भाषा की लिपि Hindi Bhasha Ki Lipi Kya Hai | Devanagari Lipi in Hindi

Hindi Bhasha Ki Lipi Kya Hai | हिन्दी भाषा की लिपि | लिपि किसे कहते है | Devanagari Lipi in Hindi

आमतौर पर जब भी हमें किसी को कुछ भी बोलना हो या समझाना हो तो तीन तरीकों से अपनी बात किसी को भी समझा सकते है, बोलकर लिखकर और इशारों के माध्यम से।

लेकिन जब हमें किसी को लिखकर समझाना होता है तो किसी भी भाषा को बड़ी ही आसानी से लिख लेते है, किसी भाषा को लिखने के लिए सबसे जरूरी तकनीक है तो वह है ‘लिपि’

Hello Friends, स्वागत है आपका हमारे ब्लॉग पर आज हम बात करने जा रहे है कि लिपि किसे कहते है? हिन्दी भाषा की लिपि क्या है? (Hindi Bhasha Ki Lipi Kya Hai) किसी भी भाषा के लिए लिपि का प्रयोग क्यों आवश्यक है? साथ ही इससे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण चीजों के बारे में।

Hindi Bhasha Ki Lipi Kya Hai
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लिपि किसे कहते है? –

अपने दैनिक जीवन में जो कुछ भी बोलते है उसे लिखने के लिए किसी न किसी माध्यम का प्रयोग करते है, किसी भी भाषा को लिखने के इस तरीके को “लिपि” (Script) कहते है।

दूसरे शब्दों में कहें तो ध्वनियों को लिखने के लिए जिन चिन्हों का प्रयोग किया जाता है उसे “लिपि” कहते है।

हिन्दी भाषा की लिपि (Hindi Bhasha Ki Lipi Kya Hai) –

Hindi Bhasha Ki Lipi Kya Hai – हिंदी भाषा को शब्दों के रूप में लिखने के लिए हम जिस लिपि का प्रयोग करते है, उसे “देवनागरी लिपि” कहा जाता है।

हिंदी को भारत की राजभाषा तथा इसकी लिपि को ‘देवनागरी’ को राष्ट्रलिपि घोषित किया गया है।

आज के समय में प्रयोग की जा रही देवनागरी लिपि पिछले सैकड़ों सालों से प्रयोग होती आ रही है और इसमें अब भी निरंतर सुधार होते रहे है।

देवनागरी लिपि –

देवनागरी लिपि अधिकतर भाषाओं की तरह ही बाएं से दायें तरफ की ओर लिखी जाती है, इस लिपि में प्रत्येक शब्द के ऊपर एक रेखा खींची होती है, इस रेखा को शिरो रेखा कहते है।

देवनागरी लिपि का विकास कालांतर में ब्राह्मी लिपि से हुआ है, यह ध्वनि से युक्त और प्रचलित लिपियों (रोमन, अरबी, चीनी आदि) में सबसे अधिक वैज्ञानिक है।

देवनागरी लिपि में लिखी गई ऋग्वेद की पांडुलिपि

भारतीय भाषाओं के किसी भी शब्द या ध्वनि को देवनागरी लिपि में ज्यों का त्यों लिखा जा सकता है और फिर लिखे पाठ को लगभग उसी तरह (‘हू-ब-हू’) उच्चारण किया जा सकता है।

जो कि रोमन लिपि और अन्य कई लिपियों में सम्भव नहीं है, जब तक कि उनका विशेष मानकीकरण न किया जाये, जैसे आइट्रांस या IAST।

भारत प्रचलित कई लिपियाँ देवनागरी लिपि से बहुत अधिक मिलती-जुलती हैं, जैसे- गुजराती, गुरुमुखी, बांग्ला आदि।

भारत के साथ एशिया की अनेक लिपियों के संकेत देवनागरी से अलग हैं, परन्तु उच्चारण व वर्ण-क्रम आदि देवनागरी के ही समान हैं, क्योंकि वे सभी ब्राह्मी लिपि से उत्पन्न हुई हैं (उर्दू भाषा की लिपि को छोड़कर) इसलिए इन लिपियों को परस्पर आसानी से लिप्यन्तरित किया जा सकता है।

देवनागरी लिपि वर्णमाला में कुल 46 वर्ण है, इसके अलावा 3 संयुक्त वर्ण, 1 मिश्र वर्ण, तथा 2 आयोगवाह वर्ण है, इन सभी को जोड़ दिया जाए तो इसकी कुल संख्या 52 होती है।

इसमें अक्षरों की क्रम व्यवस्था (विन्यास) भी बहुत ही वैज्ञानिक है, स्वर-व्यंजन, कोमल-कठोर, अल्पप्राण-महाप्राण, अनुनासिक्य-अन्तस्थ-उष्म इत्यादि वर्गीकरण भी वैज्ञानिक आधार पर किया गया हैं।

देवनागरी लेखन की दृष्टि से सरल, सौन्दर्य की दृष्टि से सुन्दर और वाचन की दृष्टि से सुपाठ्य (आसानी से पढ़ने योग्य) है। (Hindi Bhasha Ki Lipi Kya Hai)

देवनागरी लिपि का इतिहास –

देवनागरी लिपि भारत, नेपाल, तिब्बत और दक्षिण पूर्व एशिया की लिपियों के ब्राह्मी लिपि परिवार का हिस्सा है।

बीते समय में गुजरात से कुछ अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिनकी भाषा संस्कृत है और इसकी लिपि नागरी लिपि है, पप्रत हुए यह अभिलेख पहली ईसवी से लेकर चौथी ईसवी के समय के हैं।

ध्यान देने योग्य यह है कि नागरी लिपि, देवनागरी से बहुत निकट है और देवनागरी लिपि पहले नागरी लिपि ही थी, अतः ये अभिलेख इस बात के साक्ष्य हैं कि भारत में प्रथम शताब्दी में भी देवनागरी का प्रयोग आरम्भ हो चुका था।

मध्यकाल के मौजूद शिलालेखों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि उस समय नागरी से सम्बन्धित लिपियों का बड़े पैमाने पर प्रसार होने लगा था, इन शिलालेखों में कहीं-कहीं स्थानीय लिपि और नागरी लिपि दोनों भाषाओं में सूचनाएँ अंकित मिलतीं हैं।

उदाहरण के तौर पर बात करें तो, 7वीं – 8वीं शताब्दी के कर्नाटक में स्थित पट्टदकल्लु मन्दिर परिसर के स्तम्भ पर सिद्धमात्रिका और तेलुगु-कन्नड लिपि के आरम्भिक रूप – दोनों में ही सूचना लिखी हुई है, तथा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) के ज्वालामुखी अभिलेख में शारदा और देवनागरी दोनों लिपियों में लिखा हुआ है।

लगभग 7वीं शताब्दी तक देवनागरी लिपि का लेखन में नियमित रूप से उपयोग होना आरम्भ हो गया था और लगभग 1000ई तक देवनागरी का पूर्ण विकास हो गया था।

देवनागरी लिपि की विशेषताएं –

1. भारतीय भाषाओं के लिये वर्णों की पूर्णता एवं सम्पन्नता, इस लिपि में कुल 46 वर्ण है, इसके अलावा 3 संयुक्त वर्ण, 1 मिश्र वर्ण, तथा 2 आयोगवाह वर्ण है, इन सभी को जोड़ दिया जाए तो इसकी कुल संख्या 52 होती है, जो न तो कम है और न ही ज्यादा।

2. एक ध्वनि के लिये एक सांकेतिक चिह्न बनाए गए है, किसी भी शब्द या वर्ण को जैसा बोला जाता है वैसा ही लिखा जाता है, इसके लेखन और उच्चारण में एकरूपता है।

3. एक सांकेतिक चिन्ह के द्वारा केवल एक ध्वनि का निरूपण (निर्धारण) किया गया है, ताकि जैसा लिखें वैसा पढ़ें, इसके उच्चारण और लेखन में एकरूपता है, इसमें कोई अनुच्चरित वर्ण या साइलन्ट वर्ण नहीं होता है, जबकि रोमन लिपि में कुछ साइलेंट वर्ण होते है, जैसे –

‘K’nife – नाइफ, ‘K’nowledge – नॉलेज, ‘K’now – नो, ‘P’sychology -साइकोलॉजी इत्यादि, यहाँ सारे शब्दों में ‘K’ और ‘P’ बोलते समय साइलेंट है, जबकि लिखते समय इसे लिखा जाता है।

इन गुणों के कारण ब्राह्मी लिपि का प्रयोग करने वाली सभी भारतीय भाषाएं, स्पेलिंग में होने वाली समस्या (error) से मुक्त है।

4. देवनागरी लिपि के वर्णों का क्रम विन्यास बहुत ही वैज्ञानिक है, इसके वर्णों का क्रम विन्यास इनके उच्चारण के स्थान (ओष्ठ्य, दन्त्य, तालव्य, मूर्धन्य आदि) के आधार पर बनाया गया है, इसके साथ ही इस क्रम के निर्धारण में भाषा विज्ञान के अन्य पहलुओं का भी ध्यान रखा गया है।

देवनागरी लिपि (Hindi Bhasha Ki Lipi Kya Hai) की वर्णमाला (वास्तव में, ब्राह्मी से उत्पन्न सभी लिपियों की वर्णमालाएँ) बिल्कुल तर्कपूर्ण और इसको बोलते समय उत्पन्न ध्वनि के क्रम में (Phonetic Order) व्यस्थित किया गया है।

5. वर्णमाला का यह क्रम इतना तर्कपूर्ण है कि अन्तरराष्ट्रीय ध्वन्यात्मक संघ (IPA) ने अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला के निर्माण के लिये मामूली परिवर्तनों के साथ इसी क्रम को स्वीकार किया है।

अन्तरराष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला एक ऐसी लिपि है, जिसमें विश्व की सारी भाषाओं की ध्वनियों को लिखा जा सकता है, इसके प्रत्येक अक्षर और उसकी ध्वनि का एक-से-एक का सम्बन्ध होता है।

6. वर्णों का प्रत्याहार रूप में उपयोग – माहेश्वर सूत्र में देवनागरी वर्णों को एक विशिष्ट क्रम में सजाया गया है। इसमें से किसी वर्ण से आरम्भ करके किसी दूसरे वर्ण तक के वर्णसमूह को दो अक्षर का एक छोटा नाम दे दिया जाता है जिसे ‘प्रत्याहार’ कहते हैं, प्रत्याहार का प्रयोग करते हुए सन्धि आदि के नियम अत्यन्त सरल और संक्षिप्त ढंग से दिए गये हैं (उदाहरण के तौर पर, आद् गुणः)।

7. मात्राओं की संख्या के आधार पर छन्दों का वर्गीकरण – यह भारतीय लिपियों की अद्भुत विशेषता है कि किसी पद्य के लिखित रूप से मात्राओं और उनके क्रम को गिनकर बताया जा सकता है कि कौन सा छन्द है, रोमन, अरबी एवं अन्य में यह गुण अप्राप्य है।

8. देवनागरी लिपि के चिह्नों के नाम और ध्वनि में कोई अन्तर नहीं है (जैसे – रोमन भाषा में अक्षर का नाम “बी” है और ध्वनि “ब” है)

9. देवनागरी लिपि के वर्णों का उपयोग संख्याओं को निरूपित करने के लिये किया जाता रहा है। उदाहरण के तौर पर आर्यभट्ट ने आर्यभटीय के ‘गीतिकापादम्’ नामक अध्याय में संख्याओं को ‘शब्दों’ के रूप में बदलने की पद्धति का विवरण दिया है, इस सिस्टम की मुख्य विशेषता यह है कि इसके उपयोग से गणित तथा खगोलिकी में आने वाली संख्याएँ भी श्लोकों में आसानी से प्रयोग की जा सकती थीं।

10. मात्राओं का प्रयोग – देवनागरी लिपि में मात्राओं का प्रयोग बहुत सरल रूप में किया गया है, किसी भी वर्ण के ऊपर अलग-अलग स्वरों के प्रयोग से अलग-अलग मात्राओं को बनाया जाता है।

11. अर्ध-अक्षर की सरलता – (1.) खड़ी पाई को हटाकर – दायें से बाएं के क्रम में लिखकर (2.) अर्ध अक्षर को ऊपर तथा उसके नीचे पूर्ण अक्षर को लिखकर, ऊपर नीचे क्रम में संयुक्ताक्षर बनाने की दो प्रकार की रीति प्रचलित है, देवनागरी लिपि छोटे अक्षर (Small Letters) तथा बड़े अक्षर (Capital Letters) की अवैज्ञानिक व्यवस्था से मुक्त है।

12. इस लिपि में बायें से दायें, शिरोरेखा, संयुक्ताक्षरों का प्रयोग तथा अधिकांश वर्णों में एक उर्ध्व-रेखा की प्रधानता, अलग-अलग स्वरों के माध्यम से अनेक ध्वनियों को निरूपित करने की क्षमता आदि, इस लिपि को खास बनाती है।

13. देवनागरी लिपि में प्रत्येक ध्वनि को लिखने की क्षमता है, हम जो भी ध्वनि बोल सकते है उसे बड़ी ही आसानी से लिख भी सकते है, उदाहरण के तौर पर – ड़, र को हम अलग-अलग बोलते है जबकि अंग्रेजी में इन दोनों के लिए एक ही अक्षर ‘R’ है, जंजीर और जंजीड़ दो अलग शब्द है जबकि इनकी अंग्रेजी Janjeer होती है, इससे कभी-कभी इसे बोलने में दुविधा हो जाती है।

14. देवनागरी लिपि में प्रत्यरक वर्ण का उच्चारण स्थान निश्चित है और यह हमेशा एक सा ही राहत है, जबकि रोमन लिपि में एक ही शब्द को कई तरीकों से बोल जा सकता है।

But – बट – ‘अ’ का उच्चारण, Put – पुट – यू का उच्चारण, यहाँ पर दोनों शब्दों में काफी समानताएं है लेकिन पहले शब्द में, ‘u’ का अर्थ ‘अ’ के रूप में तथा दूसरे शब्द में ‘u’ का अर्थ ‘उ’ के रूप में है।

देवनागरी लिपि का भाषाओं में प्रयोग –

भारत में बहुत सी ऐसी भाषाएं है जिनको लिखने के लिए देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जाता है, नीचे ये कुछ भाषाएं है –

हिन्दी, संस्कृत, मराठी, अवधी, नेपाली, कोंकणी, खालिङ, गुर्जरी, चाम्लिङ, खानदेशी, वाम्बुले, चम्बयाली, चुराही, चेपाङ भाषा, गढ़वाली, कोया, खड़िया, गुरुङ, गोण्डी, जुम्ली, वागडी, जिरेल, वारली, किन्नौरी, कांगड़ी, कश्मीरी, कनौजी, कुमाऊँनी, कुड़माली, छत्तिसगढ़ी, छिन्ताङ, तिलुङ इत्यादि भाषाएं देवनागरी लिपि की मदद से ही लिखी जाती है। (Hindi Bhasha Ki Lipi Kya Hai)

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