Hindi Varnamala Chart ᐈ (हिंदी वर्णमाला) Varnamala in Hindi

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किसी भी भाषा में शब्दों का एक बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है, शब्द ही होते है जिनकी मदद से हम किसी भी भाषा को लिख पाते है, किसी भी भाषा को जितना बोलना जरूरी होता है उतना ही महत्वपूर्ण उसे लिपिबद्ध तरीके से लिखना भी जरूरी होता है।

हमारी हिंदी भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाती है और हर भाषा की तरह इसमें भी छोटे-छोटे शब्दों से मिलकर एक बड़ी लाइन बनती है, लेकिन इन शब्दों को बनाने का काम करता है “वर्ण”

बिना वर्णों के किसी भी शब्द को बनाया नहीं जा सकता है ये हिंदी भाषा के शब्दों की सबसे छोटी इकाई है, इसलिए हिंदी भाषा के सम्पूर्ण ज्ञान के लिए लिए सबसे पहले वर्ण-अक्षर की जानकारी होना आवश्यक है।

Hello Friends, स्वागत है आपका हमारे ब्लॉग पर आज हम बात करने जा रहे है, हिंदी वर्णमाला के बारे में…. Hindi Varnamala क्या है? इसके क्या प्रयोग है? इसको कैसे उच्चारण करें? हिंदी वर्णमाला का प्रयोग कैसे करें? Hindi Varnamala Chart तथा इससे जुड़ी और भी ढेर सारी चीजों के बारे में बिल्कुल सरल भाषा में, जो आपको आसानी से समझ आ जाएगा।

Hindi Varnamala Chart
Thumbnail (वर्णमाला क्या है? Hindi Varnamala Chart)

Table of Contents

Varnamala in Hindi वर्णमाला किसे कहते है? –

वर्ण के उच्चारण समूह को वर्णमाला कहते है, Hindi Varnamala समूह में कुल 46 वर्ण है, इसके अलावा 3 संयुक्त वर्ण, 1 मिश्र वर्ण, तथा 2 आयोगवाह वर्ण है, इन सभी को जोड़ दिया जाए तो इसकी कुल संख्या 52 होती है।

इन सभी को अगर विस्तार से रखा जाए तो, 11 स्वर, 4 अंतःस्थ, 4 संयुक्त व्यंजन, 1 अनुस्वार, 25 स्पर्श व्यंजन, 4 ऊष्म व्यंजन, 2 द्विगुण व्यंजन तथा 1 विसर्ग होते है।

Hindi Varnamala में वर्णों का क्रम उनके वर्गीकरण के आधार पर किया गया है, वर्णों का वर्गीकरण दो प्रकार से किया गया है, जिसमें पहला वर्गीकरण इस आधार पर किया गया है कि वर्णों के उच्चारण में जीभ किन अंगों को स्पर्श करती है।

इस आधार पर वर्णों का वर्गीकरण करने से स्वरों का तो कोई वर्ग नहीं बनता है, क्योंकि स्वरों के उच्चारण में जीभ मुंह के अन्य किसी अंगों को स्पर्श नहीं करती, लेकिन व्यंजन के कई वर्ग हो जाते है।

क्योंकि व्यंजनों के उच्चारण में हमारी जीभ उन्हें बोलते समय मुंह के अलग-अलग अंगों (भागों) को स्पर्श करती है, इस कारण से व्यंजन के कई वर्ग बनाये गए है, जो कुछ इस प्रकार है –

स्पर्श के आधार पर और दूसरा उच्चारण के आधार पर इन्हें स्वर और व्यंजन के रूप में दो भागों में विभाजित किया गया है, स्वर तथा व्यंजन के इन सभी प्रकारों के बारे में आगे विस्तार पूर्वक दिया गया है।

Hindi Varmala Chart
वर्णों के प्रकार (Hindi Varnamala Chart)

स्वर वर्ण के प्रकार –

स्वर वर्ण उन वर्णों को कहते है जिनका उच्चारण स्वतंत्र रूप से किया जाता है, Hindi Varnamala में स्वरों की कुल संख्या मूलतः 11 मानी जाती है।

यदि इसमें दो आयोगवाह अं, अः को भी शामिल कर लिया जाए तो इनकी कुल संख्या 13 हो जाती है, लेकिन जब भी आपसे परीक्षा में स्वरों की संख्या पूछी जाये तो आपको 11 ही बताना है।

Hindi Varnamala के मूल स्वर निम्न है – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ

स्वरों की पहचान करने का सबसे आसान तरीका यह है कि इनके उच्चारण के समय बिना किसी रुकावट के हमारे मुंह से वायु निकलती है।

(A) स्वरों का उनके उच्चारण के आधार पर वर्गीकरण –

ह्रस्व स्वर – ह्रस्व स्वर वे स्वर है जिनके उच्चारण (बोलने) में कम समय लगता है , यह लगने वाला समय एक मात्र का होता है, इन स्वरों को हस्व स्वर कहा जाता है।

ह्रस्व स्वर की संख्या 3 है, और वे स्वर है – अ, इ, उ।

दीर्घ स्वर – दीर्घ स्वर वे स्वर है जिनके उच्चारण में अधिक समय लगता है, इनके उच्चारण के समय हमारे मुंह से हस्व स्वर कि तुलना में ज्यादा वायु निकलती है।

दीर्घ स्वर की संख्या 8 होती है और वे स्वर निम्न है – आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ तथा ऋ।

प्लुत स्वर – प्लुत स्वरों के उच्चारण में मूल स्वर स्वर से लगभग तीन गुना ज्यादा समय लगता है, आजकल इसका प्रयोग बहुत कम किया जाता है, इस कारण से इसे कई पाठ्यक्रमों में इसको शामिल भी नहीं किया जाता है, इस पोस्ट में इसको शामिल करने का उद्देश्य है कि सभी स्वरों के बारे में जानकारी प्राप्त हो जाये।

प्लुत स्वर के कुछ उदाहरण निम्न है जैसे – ओ३म, हे! रा३म

Hindi Varnamala Chart
स्वरों का वर्गीकरण (Hindi Varnamala Chart)

(B) स्वरों का बनावट के आधार पर वर्गीकरण –

बनावट के आधार पर स्वर दो प्रकार के होते है –

मूल स्वर – जो स्वर बिना किसी दूसरे स्वर के जोड़ से बनते है, उन्हें मूल स्वर कहा जाता है, बनावट के आधार पर मूल स्वर कुछ इस प्रकार है – अ, इ, उ, ऋ।

संधि स्वर – जो स्वर अन्य स्वरों के जोड़ने पर मिलकर बनते है उन्हें संधि स्वर कहा जाता है, संधि स्वर कुछ इस प्रकार से होते है-

अ + अ = आअ + ए = ऐ
इ + इ = ई अ + उ = ओ
उ + उ = ऊ अ + ओ = औ
अ + इ = ए

(B) स्वरों का जाति के आधार पर वर्गीकरण –

जाति के आधार पर वर्णों का वर्गीकरण दो तरह से किया गया है, जो कुछ इस प्रकार है –

सजातीय स्वर – सजातीय स्वर के अंतर्गत अ, आ, इ, ई, उ, ऊ इत्यादि वर्ण आते है।

विजातीय स्वर – ए, ऐ, ओ, औ इत्यादि विजातीय स्वर के अंतर्गत आते है।

स्वरों की मात्राएं –

जब स्वरों को व्यंजन के साथ मिलकर लिखा जाता है तब इनकी केवल मात्राएं ही लगाई जाती है, किसी स्वर के उच्चारण में जो समय लगता है, उसे ‘मात्रा’ कहते है, स्वरों का प्रयोग व्यंजनों के साथ दो प्रकार से किया जाता है –

स्वतंत्र रूप में – जब स्वरों का प्रयोग व्यंजनों के साथ अपने मूल रूप में होता है, तो वह स्वतंत्र रूप कहा जाता है, जैसे आज, अब, इधर, उधर इत्यादि।

मात्रा के रूप में – जब स्वरों को व्यंजनों के साथ जोड़ा जाता है, तो उन स्वरों का अपना स्वरूप बदल जाता है, स्वरों के इस बदले स्वरूप को मात्रा कहते है।

स्वरमात्रा चिन्ह मात्रयुक्त रूप उदाहरण (अन्य उदाहरण)
क् + अरजत (मदन, कमल, हसन)
क् + आ काम (राम, नाम, दाम, शाम)
ि व् + इ विमला (शिमला, किसका, निकला)
ग् + ई गीता (मीत, शीतल, मीर)
प् + उ पुत्र (कुल, पुल)
ध् + ऊ धूप (सूप, कूप, सूत)
क् + ए केला (मेला, ठेला, घेरा)
क् + ऐकैसा (जैसा, कैलाश, रैदास)
म् + ओ मोर (छोर, लोग, ओखल)
च् + औ चौकीदार (और, औसत, चौरासी, चौखट)

स्वरों से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें –

1. स्वर में ‘अ’ की मात्रा नही होती है।

2. ‘अ’ की सहायता से ही सभी व्यंजन बोले जाते है, जैसे क, ख, ग, घ, च, य, र, ल, प, म इत्यादि।

3. ‘अ’ से रहित व्यंजनों को कुछ इस प्रकार लिखते है, क्, ख्, ग्, घ्, च्, र्, म्, भ् इत्यादि।

4. व्यंजनों के नीचे लगी तिरछी रेखा को ‘हलन्त’ कहा जाता है।

5. ‘अ’ की कोई मात्रा नहीं होती है क्योंकि यह सभी व्यंजन में लगा होता है।

व्यंजन वर्ण के प्रकार –

Hindi Varnamala के जिन वर्णों का उच्चारण स्वरों की सहायता के बिना नहीं होता है, वे ‘व्यंजन’ कहलाते है।

अथवा

व्यंजन वे वर्ण है जिनका उच्चारण स्वर की सहायता से होता है, प्रत्येक स्वतंत्र वर्ण के उच्चारण में ‘अ’ स्वर की ध्वनि छिपी होती है, हिंदी वर्णमाला में व्यंजनों की संख्या 33 है।

जीभ के स्पर्श के आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण –

व्यंजनों के उच्चारण के समय हमारी जीभ के विशेष अंगों के स्पर्श के आधार पर व्यंजन मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते है।

इन्हें बोलने पर हमारी जीभ मुंह के किसी न किसी अंग को स्पर्श करती है, इसी स्पर्श के आधार पर इनका वर्गीकरण किया गया है, इन्हें आसानी से समझा जा सके।

1. स्पर्श व्यंजन – जिन वर्णों को बोलने में वायु किसी विशेष स्थान को स्पर्श करती हुई बाहर निकलती है, उन्हें स्पर्श व्यंजन कहते है, स्पर्श व्यंजनों की संख्या 25 है जो 5 वर्गों में बंटे हुए है।

स्पर्श व्यंजन का उच्चारण किसी विशेष अंग अथवा अंगों की सहायता से होता है, इसके उच्चारण में कंठ के अलावा जिह्वाग्र द्वारा तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ इत्यादि स्थानों के स्पर्श से होता है।

अपने उच्चरण के विशेष स्थान का प्रयोग होने से अलग-अलग वर्ग बने होने के कारण स्पर्श व्यंजन को वर्गीय व्यंजन भी कहा जाता है।

वर्ग वर्ण उच्चारण का स्थान
क वर्गक, ख, ग, घ, ङ़कण्ठ से उच्चारित वर्ण
च वर्गच, छ, ज, झ, ञतालु से उच्चारित वर्ण
ट वर्गट, ठ, ड, ढ, णमूर्धा से उच्चारित वर्ण
ट वर्गत, थ, द, ध, नदंत्य से उच्चारित वर्ण
प वर्गप, फ, ब, भ, मओष्ठ (Lip) से उच्चारित वर्ण

2. अंन्तःस्थ व्यंजन – जो वर्ण स्वर तथा व्यंजन के मध्य स्थित है, जिस कारण अंतःस्थ व्यंजन कहे जाते है, इनकी संख्या चार होती है – य्, र्, ल्, व्।

3. ऊष्म व्यंजन – जिन व्यंजनों के उच्चारण मे मुंह से गर्म हवा- सी निकलती है उन्हें ऊष्म व्यंजन कहते है, इनको ऊष्म व्यंजन मानने के पीछे कारण यह है कि इनके उच्चारण में घर्षण से उत्पन्न वायु का निष्कासन होता है, यह हवा ज्यादा मात्रा में नहीं निकलती है इसे आप थोड़ा बहुत महसूस कर सकते है।

ऊष्म व्यंजन की संख्या चार होती है – श्, स्, ह्, ल्।

Hindi Varnamala Chart
व्यंजनों का वर्गीकरण (Hindi Varnamala Chart)

परस्पर मेल के आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण –

एक समान अथवा भिन्न-भिन्न व्यंजनों के मेल के आधार पर भी व्यंजनों के भेड़ निश्चित किये गए है, इस आधार पर व्यंजनों के दो प्रकार है –

1. संयुक्त व्यंजन – दो अलग-अलग व्यंजनों के परस्पर मिलने को संयुक्त व्यंजन कहते है, ये चार प्रकार के होते है।

श्र = श् + रक्ष = क् + ष
ज्ञ = ज् + त्र = त + र

2. द्वित्व व्यंजन – एक जैसे वर्ण वाले व्यंजनों के मिलने को ‘द्वित्व व्यंजन’ कहते है, उदाढ़ के तौर पर – क्क (चक्का), च्च (कच्चा), ब्ब (डिब्बा), म्म (सम्मान) इत्यादि।

इसके अलावा ‘ड़’ तथा ‘ढ़’ दो ऐसे व्यंजन है, जो द्विगुण व्यंजन कहलाते है, शब्दों के अंत में ड़, ढ़ वर्ण का प्रयोग होता है जैसे – बाढ़, गूढ़, गाढ़ा, बूढ़ा और बाड़, ताड़, मेड़, तोड़ इत्यादि।

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि ये वर्ण किसी भी शब्दों के प्रारंभ में कभी नहीं आते है और वहां मूल वर्ण ‘ड’ और ‘ढ’ ही प्रयोग होता है, जैसे – डंडा, डिस्को, डलिया और ढाक, ढक्कन, ढीला इत्यादि।

श्वास की मात्रा के आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण –

वर्णों के उच्चारण के आधार पर व्यंजन मुख्यतः दो प्रकार के होते है, जिसमें पहला है अल्पप्राण और दूसरा है महाप्राण नीचे ईन दोनों के बारे में विस्तार से बताया गया है।

1. अल्पप्राण – जिन वर्णों का उच्चारण करते समय मुख से निकलने वाली हवा की मात्रा अल्प तथा कमजोर होकर निकलती है, उन्हें “अल्पप्राण व्यंजन” कहा जाता है।

प्रत्येक वर्ण समूह का पहला, तीसरा तथा पाँचवाँ वर्ण अल्पप्राण कहलाता है और अंतःस्थ व्यंजन भी अल्पप्राण व्यंजन कहलाते है ये वर्ण निम्न है – क, ग, ….., च, ज, ञ, ट, ड, ण, त, द, न, प, ब, म, य, र, ल, व्, ड इत्यादि अल्पप्राण व्यंजन के अंतर्गत आते है।

2. महाप्राण – जिन व्यंजनों को बोलने में वायु की मात्र अधिक तथा अधिक वेग से निकलती है, उन्हें “महाप्राण” व्यंजन कहते है, प्रत्येक वर्ग का दूसरा, चौथा तथा सभी ऊष्म वर्ण “महाप्राण” है।

महाप्राण के अंतर्गत ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ, भ, श, ष, स, ह इत्यादि वर्ण आते है।

आयोगवाह –

स्वर तथा व्यंजनों के अतिरिक्त Hindi Varnamala में तीन वर्ण और भी होते है, ये न तो स्वर है और न ही व्यंजन होते है, इनकी संख्या तीन है।

अनुनासिक – अनुनासिक के उच्चारण में हवा नायक तथा मुंह दोनों से निकलती है, इसको दर्शाने के लिए वर्ण के ऊपर चंद्र बिन्दु का प्रयोग किया जाता है, जैसे – हँसी, चाँद इत्यादि।

अनुस्वार – इसका प्रयोग वर्ण के ऊपर एक बिन्दु के रूप में किया जाता है जैसे – कंपन, हिंदी, संस्था, मंडी, संकुल इत्यादि।

विसर्ग – विसर्ग का प्रयोग हमेशा किसी वर्ण के बाद ही होता है, इसको पढ़ते समय शब्द बोलने के बाद ह शब्द की ध्वनि निकालते है, जैसे – अतः, प्रातः, पुनः इत्यादि।

सघोष तथा अघोष –

ध्वनि के उच्चारण में तंत्रियों के कम्पन की प्रक्रिया होती है, इस कम्पन के कारण वर्ण के उच्चारण के साथ जो तरंग वायु के साथ बाहर आती है, उन्हें घोष कहा जाता है, इसी आधार पर घोष को दो भागों में बांटा गया है।

सघोष –

जब स्वर तंत्रियाँ एक दूसरे के निकट आकर वायु में कम्पन पैदा करती हुई ध्वनि के उच्चारण में सहायता करती है तो ऐसी ध्वनियों को ‘सघोष’ कहते है।

सभी स्वर वर्ण प्रत्येक व्यंजन वर्ण का तीसरा चौथा पाँचवाँ वर्ण तथा अंतःस्थ वर्ण (य, र, ल, व, ह) सघोष कहलाते है।

अघोष –

बोलते समय जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वर तंत्रिकाएं एक दूसरे से दूर-दूर और वायु तंत्रिकाओं में बिना कम्पन किये निकल जाती है, ऐसे वर्णों को अघोष वर्ण कहा गया है, व्यंजन वर्ग का पहला, दूसरा तथा ऊष्म वर्ण (श, ष, स) अघोष है।

Varnamala in Hindi Chart images –

स्वर (11 स्वर तथा 1 विसर्ग और 1 अनुस्वार)

(A)(AA)(I)(EE)(U)(OO)
(E)(AI)(O)(AU)अं (AN)अः (AH)

11 स्वरों के अलावा 2 अतिरिक्त वर्ण जिनमें ‘अं’ एक अनुस्वार वर्ण तथा ‘अः’ एक विसर्ग वर्ण है।

व्यंजन (33)

(K) (KH) (G) (GH)ङ़ (NGA)
(CH) (CHH) (J) (JH) (NYA)
(T) (THH) (DA) (DH) (N)
(T) (THA) (D) (DHA) (NA)
(P) (FA) (B)(BHA) (MA)
(Y) (R) (LA) (V) (SHA)
(SHHA)(SA) (HA)

संयुक्त व्यंजन (4)

क्ष (KSH)*त्र (TR)*ज्ञ (GY)*श्र (SHR)*

अतिरिक्त व्यंजन (2)

………..ङ़ (NA)ढ़ (NA)

हिंदी वर्णमाला में 11 स्वर + 33 व्यंजन + 1 अनुस्वार + 1 विसर्ग + 2 अतिरिक्त व्यंजन = 52 वर्ण होते है।

Combination of Letters वर्ण संयोग –

Hindi Varnamala के जब दो अलग-अलग वर्ण वर्ण परस्पर मिलते है, तो उनके मेल को वर्ण संयोग कहते है, वर्ण संयोग या वर्णों का मिलना दो प्रकार से होता है।

व्यंजन का स्वर से संयोग –

व्यंजनों के उच्चारण के लिए स्वरों की सहायता ली जाती है, जब कोई व्यंजन स्वर रहित होता है तो उसके नीचे हलंत लगा देते है, उदाहरण के तौर पर – च्, छ्, ज्, झ्, त्, व्, फ्, ब्, भ्, म्, र्, स्, ल्, क्, ख् इत्यादि।

इनके संयोग – त् + ई = ती, च् + ऐ = चै, फ् = इ = फि, च् + इ = चि, च् + ई = ची इत्यादि।

व्यंजन का व्यंजन से संयोग –

जब एक स्वर रहित व्यंजन किसी दूसरे स्वर युक्त व्यंजन से मिलता है, तब कुछ नियमों के आधार पर वर्ण-संयोग होता है, इसके कुछ प्रमुख नियम इस तरह है।

1. कुछ व्यंजनों के अंत में खड़ी पाई (ा) होती है, जब किसी खड़ी पाई वाले व्यंजन को दूसरे व्यंजन से मिलाते है, तो उस समय पहले व्यंजन की खड़ी पाई को हटा देते है।

उदाहरण के तौर पर – प् + त = प्त (व्याप्त), च् + चा = च्चा (बच्चा), च् + छ = च्छ (अच्छा)

2. Hindi Varnamala के कुछ व्यंजनों में खड़ी पाई नहीं होती, जब बिना पाई वाले व्यंजन को दूसरे व्यंजन से मिलाते है, तब बिना पाई के व्यंजन का हलंत लगाकर दूसरा व्यंजन पूरा लिख देते है।

उदाहरण के तौर पर इसे देखें – ड् + डा = ड्डा (अड्डा), द् + ध = द् ध या द्ध (अवरुद्ध)

3. ऐसेव्यंजन जिनमें खड़ी पाई (ा) और अंत में घुंडी (ऐसे वर्ण जो दाहिनी तरफ मुड़े हुए होते है जैसे क, फ), तो ऐसे वर्णों को जोड़ने के लिए संयोग के समय पहले व्यंजन की घुंडी हटा देते है।

उदाहरण के तौर पर इसे देखें – क् + त = क्त (वक्त), फ् + त = फ्त (मुफ़्त)

3. ‘र’ व्यंजन का दुसर व्यंजनों के साथ संयोग नीचे दिए गए इन नियमों के आधार पर होता है।

(क.) जब बिना स्वर वाले ‘र्’ को किसी दूसरे व्यंजन के साथ मिलाते है, तब इस ‘र’ को दूसरे व्यंजनों के ऊपर लगाया जाता है, दूसरे शब्दों में इसे ‘र-रेफ’ भी कहा जाता है।

जैसे – र् + म = र्म (चर्म, शर्म, धर्म, कर्म, कार्य, आचार्य, पर्थ, पार्थ, विपरितार्थ इत्यादि।)

(ख.) जब बिना स्वर वाले किसी भी व्यंजन को ‘र’ के साथ मिलाते है, तो मिलने के पश्चात ‘र’ को कुछ इस प्रकार से लिखते है।

क् + र = क्र (क्रमिक, क्रम, क्रिया, क्रश), भ् + र = भ्र (भ्रम, भ्रष्ट, भ्रमित, भ्राता)

(ग.) जिन व्यंजनों में खड़ी पाई (ा) नहीं होती, उनके साथ ‘र’ को कुछ इस तरह से लिखा जाता है।

जैसे – ट् + र = ट्र (ट्रेन, ट्रेंड, ट्रेनिंग, ट्रेस, ट्रैक), ड् + म = ड्र (ड्रम, ड्रिंक, ड्राफ्ट)

(घ.) ‘स’ तथा ‘त’ के साथ ‘र’ का संयोग होने के बाद इसे कुछ इस तरह लिखते है, जिसके कुछ उदाहरण इस प्रकार है –

‘स’ के साथ संयोग – स् + र = स्र (सशस्र, सहस्र, स्त्रोत), ‘त’ के साथ संयोग – त् + र = त्र (त्रिभुज, त्रिगुण, त्रिफला, त्रिदेव, त्रिशंकु, त्रिकालदर्शी)

इसके साथ ही ‘श’ को ‘र’ के साथ संयोग होने पर इसे कुछ इस तरह से लिखा जाता है, उदाहरण के तौर पर।

‘श’ का ‘र’ के साथ संयोग – श् + र = श्र (श्रम, श्रमिक, श्रमदान, श्रद्धा, श्रेष्ठ, श्रीमान, श्रीमती इत्यादि)

भाषा में उच्चारण संबंधी अशुद्धियाँ –

भाषा में अक्षरों को जिस प्रकार से बोल जाता है उसे उच्चारण कहते है, भाषा में उच्चारण का अपना महत्व है, कहा जाता है कि “आप जैसा बोलते है वैसा आप लिखते भी है”।

इसलिए यदि आप सही से लिखना चचते है तो पहले सही उच्चारण करना सीखिए, अशुद्ध उच्चारण से वर्तनी में अनेक अशुद्धियाँ आ जाती है।

मात्रा संबंधी अशुद्धियाँ –

इसलिए इन अशुद्धियों को दूर करने के लिए आपको थोड़ी प्रैक्टिस और नीचे दिए गए इन अशुद्धियों पर ध्यान देने की जरूरत है, जिसे अक्सर लोग बोलते समय करते है।

1. प्रायः स्वरों के चिन्हों (मात्राओं) के गलत प्रयोग के कारण वाक्य में अशुद्धि हो जाती है, देखने पर यह पता नहीं चलता है लेकिन पढ़ते समय इस गलत मात्र की वजह से कभी-कभी गलत अर्थ बन जाते है।

अशुद्ध वाक्य – आज असमान साफ है, शुद्ध वाक्य – आज आसमान साफ है

पहले वाक्य में ‘असमान’ का अर्थ होता है ‘जो समान न हो’ जबकि दूसरे वाले शब्द ‘आसमान’ का अर्थ ‘आकाश’ होता है।

2. शब्दों के उच्चारण के समय कभी-कभी बीच के आधे अक्षर को भी पूरे अक्षर की भांति बोल देते है, जो कि सामने वाले व्यक्ति के ऊपर गलत प्रभाव डालता है, ये शब्द है गर्म- गरम, शर्म – शरम इत्यादि, अन्य उदाहरण के लिए इन वाक्यों को देखें।

अशुद्ध वाक्य – लक्षमण श्रीराम के भाई थे, शुद्ध वाक्य – लक्ष्मण राम के भाई थे। शुद्ध वाक्य – ये बहुत अच्छी फिलम है, शुद्ध वाक्य – ये बहुत अच्छी फिल्म है।

3. कभी-कभी हम पूरे उच्चारण को आधा कर देते है, जिससे शब्द गलत हो जाता है, इसलिए बोलते समय इसका ध्यान रखना चाहिए, उदाहरण के तौर पर इसे देखें –

अशुद्ध वाक्य – दूसरों के बारे में गल्त सोचना अच्छी बात नहीं है। शुद्ध वाक्य – दूसरों के बारे में गलत सोचना अच्छी बात नहीं है।

अशुद्ध वाक्य – स्वर्ग तथा नर्क पृथ्वी पर ही है। शुद्ध वाक्य – स्वर्ग तथा नर्क पृथ्वी पर ही है।

4. बोलते समय कभी-कभी आधे वर्ण से शुरू होने वाले शब्दों से पहले स्वर ‘इ’ या ‘आ’ जोड़ देते है, जिससे हमारा उच्चारण गलत हो जाता है, ये कुछ ऐसी गलतियों में से एक है जिनके बारे में जानकारी हमें नहीं होती है।

अशुद्ध वाक्य – रेलगाड़ी इस्टेशन पर आ रही है।, शुद्ध वाक्य – रेलगाड़ी स्टेशन पर आ रही है।
अशुद्ध वाक्य – यह अस्थान बहुत सुंदर है।, शुद्ध वाक्य – यह स्थान बहुत सुंदर है।

व्यंजनों से संबंधित अशुद्धियाँ –

1. Hindi Varnamala में आमतौर पर व्यंजनों के उच्चारण में सबसे ज्यादा ‘र’ वर्ण के उच्चारण में गलतियाँ होती है, क्योंकि अक्सर इसका प्रयोग किसी न किसी शब्द में होता है।

कुछ लोग गलत आदत के कारण इसका सही से उच्चारण नहीं कर पाते है, तो कुछ लोग सही से न पढ़ पाने के कारण इसका उच्चारण सही से नहीं कर पाते है।

नीचे ये कुछ टिप्स है जिन्हें आप ‘र’ के उच्चरण के समय ध्यान में जरूर रखें –

(क.) यदि किसी वर्ण के पैर में यानि नीचे ‘र’ लगा है तो उसे संबंधित वर्ण के मिलाकर बोलते है उदाहरण के तौर पर – क्रम, भ्रम, श्रम, क्रय, प्रण इत्यादि शब्द।

(ख.) किसी शब्द के अंतिम अक्षर के ऊपर ‘र’ लगा हो तो उस स्थिति में ‘र’ को आधा बोल जाएगा, जिसमें शुरू का अक्षर पूरा, बीच का ‘र’ आधा औ अंतिम का अक्षर पूरा बोला जाएगा, जैसे – धर्म = ध+र्+म, मर्द = म+र्+द इत्यादि।

(ग.) अगर ट, ठ, ड, ढ इत्यादि वर्णों में ‘र’ मिल हो तो जिस वर्ण के नीचे ‘र’ लगा होता है उसे आधे वर्ण की तरह तथा ‘र’ को पूरे वर्ण की तरह बोला जाएगा, जैसे – ट्रक = ट् + र + क, ड्रामा = ड् + र् + आ + म् + आ , इत्यादि।

(घ.) यदि किसी वर्ण के पैर में री की मात्रा लगी हो तो वह वर्ण कुछ इस प्रकार बोल जाता है, जैसे कि उस वर्ण के ऊपर री की मात्रा लगी हो, उदाहरण के तौर पर इसे देखें – वृक्ष, मृग, वृत्त, गृह, सरीसृप, मृत इत्यादि।

ऐसे शब्दों के अलग उच्चारण पर अर्थ में भी बदलाव आ जाता है, जैसे गृह = घर होता है लेकिन ग्रह = आकाशीय पिंड होता है। हमारे सौरमंडल में स्थित ग्रह (पृथ्वी, मंगल, बुध, शुक्र इत्यादि) होता है।

2. Hindi Varnamala व्यंजनों के उच्चारण के समय दूसरी सबसे बड़ी अशुद्धियाँ संयुक्त व्यंजनों के बोलते समय होती है, जैसा कि हमने पहले भी बात की है यदि आप लिखते गलत है तो उसका उच्चारण गलत होता है और गलत उच्चरण से दोबारा गलत शब्द लिखे जाते है।

नीचे ये कुछ ऐसे शब्द है जिनको लोग बोलते और लिखते समय गलत तरीके से प्रयोग करते है –

अशुद्ध शुद्ध उच्चारण अशुद्ध शुद्ध उच्चारण
परीच्छापरीक्षा छन क्षण
मित्तरमित्र छमा क्षमा
पुत्तर पुत्र छेत्रीय क्षेत्रीय

स्वराघात, बलाघात तथा अनुतान –

स्वराघात तथा बलाघात का संबंध शब्दों के उच्चारण के समय वर्ण पर पड़ता है, इसके द्वारा ही शब्दों को समझने की चेतना सामने आती है, जब शब्दों का उच्चारण करते हुए किसी वर्ण पर अधिक बल दिया जाता है, तो उसे ”स्वराघात” कहते है।

और जब यही बल किसी स्वर को बोलते समय किसी स्वर पर दिया जाता है तो उसे “स्वराघात” कहते है।

बलाघात का प्रभाव वर्णों के बदले शब्दों पर पड़ता है, बलाघात विशेषण के समान अर्थ का निवारण तथा परिवर्तन में सहायता प्रदान करता है।

उच्चारण के आरोह-अवरोह को “अनुतान” कहते है, अनुतान का आरोह-अवरोह ही शब्द तथा वाक्य का सही अर्थ प्रदान करता है।

विदेशी शब्द –

हमारी बोलचाल की भाषा में बाहर से आये कुछ विदेशी शब्दों का प्रयोग उनके मूल रूप में होता है, रोजाना बोलते समय आमतौर पर ये हमें हिंदी भाषा की ही लगती है लेकिन ऐसा नहीं है, बहुत से शब्द है जो अन्य भाषाओं से आदान प्रदान से हमारी भाषा में शामिल हो गए है।

जैसे – डॉक्टर, कॉलेज, कंप्युटर, स्मार्टफोन, बॉल, ज़रूर, ज़िंदगी, सज़ा, ज़ख्म और फ़ख्र इत्यादि।

ज़ और फ़ जैसे शब्द अरबी और फारसी भाषा में प्रयोग होने वाले शब्द है और ” ाॅ” का प्रयोग अंग्रेजी शब्दों के साथ होता है, इसके लिए ‘आ’ की मात्र के ऊपर यह चिन्ह लगाया जाता है, जैसे – डाक्टर – डॉक्टर, हाल – हॉल, डाल – डॉल जैसे शब्द आदि।

शब्दों में ” ाॅ” का प्रयोग किये जाने से उनके अर्थ बदल जाते है उदाहरण के तौर पर बात करें तो हिंदी में ‘डाल’ का मतलब पेड़ की मोटी टहनी से होता है, जबकि अंग्रेजी के शब्द ‘डॉल’ का अर्थ गुड़िया होता है।

Hindi Varnamala के बारे में विडिओ के रूप में सीखने के लिए इस यूट्यूब विडिओ को देखें –

Hindi Varnamala से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल –

हिंदी की वर्णमाला में कितने स्वर और व्यंजन होते है?

Hindi Varnamala समूह में कुल 46 वर्ण है, इसके अलावा 3 संयुक्त वर्ण, 1 मिश्र वर्ण, तथा 2 आयोगवाह वर्ण है, इन सभी को जोड़ दिया जाए तो इसकी कुल संख्या 52 होती है।

हिंदी वर्णमाला में स्वर कौन कौन से होते हैं?

हिंदी वर्णमाला के मूल स्वर निम्न है – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ

हिंदी में स्वरों की संख्या कितनी है?

स्वर वर्ण उन वर्णों को कहते है जिनका उच्चारण स्वतंत्र रूप से किया जाता है, Hindi Varnamala में स्वरों की कुल संख्या मूलतः 11 मानी जाती है, यदि इसमें दो आयोगवाह अं, अः को भी शामिल कर लिया जाए तो इनकी कुल संख्या 13 हो जाती है, लेकिन जब भी आपसे परीक्षा में स्वरों की संख्या पूछी जाये तो आपको 11 ही बताना है।

स्वर कितने प्रकार के होते हैं?

स्वरों का उनके उच्चारण के आधार पर वर्गीकरण के अनुसार स्वर तीन प्रकार के होते है, ह्रस्व स्वर, दीर्घ स्वर, प्लुत स्वर।

अ से ज्ञ तक वर्णमाला में कितने अक्षर होते है?

Hindi Varnamala समूह में कुल 46 वर्ण है, इसके अलावा 3 संयुक्त वर्ण, 1 मिश्र वर्ण, तथा 2 आयोगवाह वर्ण है, इन सभी को जोड़ दिया जाए तो इसकी कुल संख्या 52 होती है।

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